न्यायाधीश द्वारा दूसरे न्यायाधीश की अवमानना (Contempt by Judge of Another Judge) – एक विस्तृत विश्लेषण
न्यायाधीश द्वारा दूसरे न्यायाधीश की अवमानना (Contempt by Judge of Another Judge) – एक विस्तृत विश्लेषण
परिचय
न्यायपालिका का सम्मान और गरिमा लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि कोई न्यायाधीश किसी अन्य न्यायाधीश की अवमानना करता है, तो यह न केवल न्यायिक अनुशासन के लिए हानिकारक होता है, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है।
इस लेख में हम यह समझेंगे कि क्या एक न्यायाधीश दूसरे न्यायाधीश की अवमानना कर सकता है? यदि हां, तो इसके कानूनी परिणाम क्या होंगे? भारतीय न्याय व्यवस्था में इसके लिए क्या प्रावधान हैं?
1. न्यायिक अवमानना की परिभाषा (Definition of Judicial Contempt)
भारतीय कानून में अवमानना (Contempt of Court) को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है:
- नागरिक अवमानना (Civil Contempt) – जब कोई व्यक्ति किसी न्यायालय के आदेश, डिक्री या निर्देश का उल्लंघन करता है।
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) – जब कोई व्यक्ति न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कार्य करता है, जैसे न्यायाधीश पर अमर्यादित टिप्पणी करना, न्यायालय की कार्यवाही में हस्तक्षेप करना, आदि।
क्या न्यायाधीश भी न्यायालय की अवमानना कर सकता है?
हां, यदि कोई न्यायाधीश अपने शब्दों या कार्यों से किसी अन्य न्यायाधीश के सम्मान को ठेस पहुँचाता है या न्यायपालिका की निष्पक्षता पर आघात करता है, तो यह अपराध न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) के अंतर्गत आता है।
2. न्यायाधीश द्वारा दूसरे न्यायाधीश की अवमानना के कानूनी पहलू
(क) क्या एक न्यायाधीश को न्यायालय की अवमानना के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है?
✔ हाँ! भारतीय न्यायपालिका में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह न्यायाधीश ही क्यों न हो, न्यायालय की अवमानना से मुक्त नहीं है।
✔ यदि कोई न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से या अपने निर्णयों में दूसरे न्यायाधीश की आलोचना करता है, या उसकी न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाता है, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
(ख) न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की प्रासंगिक धाराएँ
न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 में यह स्पष्ट किया गया है कि –
▶ धारा 2(c): यदि कोई व्यक्ति (चाहे वह न्यायाधीश हो या कोई अन्य) न्यायालय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है या न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाता है, तो यह आपराधिक अवमानना होगी।
▶ धारा 12: यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की अवमानना करता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है।
(ग) भारतीय संविधान और न्यायिक अवमानना
✔ अनुच्छेद 129 – सर्वोच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति देता है।
✔ अनुच्छेद 215 – उच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति देता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई न्यायाधीश किसी अन्य न्यायाधीश की अवमानना करता है, तो सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट उसे दंडित कर सकता है।
3. क्या न्यायाधीशों के बीच मतभेद अवमानना की श्रेणी में आते हैं?
✔ सामान्य मतभेद – नहीं
✔ अपमानजनक भाषा या व्यक्तिगत हमले – हाँ
▶ न्यायाधीशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर न्यायाधीश की अपनी न्यायिक विचारधारा होती है।
▶ लेकिन यदि कोई न्यायाधीश दूसरे न्यायाधीश की आलोचना खुले मंच पर करता है, उसे अयोग्य ठहराने का प्रयास करता है, या उसके फैसलों को अपमानजनक भाषा में निरस्त करता है, तो यह न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है।
उदाहरण:
यदि कोई उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अपने फैसले में लिखता है कि "सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अनुचित है और इसमें पूर्णत: पूर्वाग्रह निहित है," तो यह न्यायालय की अवमानना मानी जाएगी।
4. महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Case Laws on Contempt by a Judge of Another Judge)
(क) रे एम.पी. द्विवेदी (Re M.P. Dwivedi, 1996)
इस मामले में, एक सत्र न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया था और इसे गलत ठहराया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायालय की अवमानना माना और संबंधित न्यायाधीश को चेतावनी दी।
(ख) पी.एन. दत्ता बनाम उच्च न्यायालय (P.N. Dutta v. High Court, 2000)
इस मामले में, एक जिला न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के फैसले पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की और इसे "न्यायिक भ्रष्टाचार" करार दिया।
परिणाम:
✔ उच्च न्यायालय ने इसे आपराधिक अवमानना माना।
✔ न्यायाधीश को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
✔ बाद में, उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी और उन्हें दंडित नहीं किया गया।
5. क्या न्यायाधीश को अवमानना के लिए दंडित किया जा सकता है?
✔ हाँ!
▶ यदि कोई न्यायाधीश जानबूझकर किसी अन्य न्यायाधीश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने का कार्य करता है, तो उसे अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत छह महीने की कैद या ₹2,000 तक का जुर्माना हो सकता है।
▶ यदि वह माफी माँग लेता है और न्यायालय उसे स्वीकार कर ले, तो उसे दंडित नहीं किया जाता।
6. न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम
✔ संविधानिक मूल्यों का पालन – न्यायाधीशों को आपसी सम्मान बनाए रखना चाहिए।
✔ मतभेदों को आंतरिक रूप से हल करना – न्यायिक विवादों को सार्वजनिक करने के बजाय, उन्हें आंतरिक रूप से सुलझाना चाहिए।
✔ न्यायिक अनुशासन और नैतिकता – न्यायाधीशों को संयम और संतुलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
✔ न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना – न्यायिक गरिमा को बनाए रखना हर न्यायाधीश की जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष
▶ न्यायाधीश भी न्यायालय की अवमानना कर सकता है यदि वह दूसरे न्यायाधीश के सम्मान को ठेस पहुँचाता है।
▶ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पास ऐसी अवमानना पर कार्रवाई करने की शक्ति है।
▶ न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना हर न्यायाधीश की जिम्मेदारी है।
इसलिए, हर न्यायाधीश को भाषा, आचरण और निर्णयों में संयम बरतना चाहिए ताकि न्यायपालिका की गरिमा बनी रहे और लोगों का न्यायिक प्रणाली पर विश्वास कायम रहे।
Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava
on
मार्च 03, 2025
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