अपराधात्मक अवमानना (Criminal Contempt) : विस्तृत विश्लेषण
परिचय
कानूनी प्रणाली की शुचिता एवं प्रभावशीलता को बनाए रखने के लिए न्यायपालिका को एक विशिष्ट अधिकार प्राप्त है, जिसे अवमानना का अधिकार कहा जाता है। यह न्यायालय की गरिमा एवं प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अनिवार्य माना जाता है। अवमानना दो प्रकार की होती है – नागरिक अवमानना (Civil Contempt) एवं अपराधात्मक अवमानना (Criminal Contempt)।
अपराधात्मक अवमानना का अर्थ
"अपराधात्मक अवमानना" का तात्पर्य न्यायालय के प्रति किसी भी प्रकार के अशोभनीय, अपमानजनक, अवज्ञाकारी, या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने वाले कृत्यों से है। इसमें न्यायालय के आदेशों, निर्णयों या कार्यवाही की अवहेलना, न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाना, न्यायालय के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी करना, या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कृत्य शामिल होते हैं।
भारत में अपराधात्मक अवमानना से संबंधित विधिक प्रावधान
भारत में न्यायालय की अवमानना से संबंधित विधि "न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971" के अंतर्गत आती है। इस अधिनियम की धारा 2(c) में अपराधात्मक अवमानना की परिभाषा दी गई है, जिसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति न्यायालय के अधिकार को कम करने, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने, या किसी निर्णय की निष्पक्षता को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो यह अपराधात्मक अवमानना होगी।
अपराधात्मक अवमानना के प्रमुख तत्व
- न्यायालय का अपमान – यदि कोई व्यक्ति न्यायालय या न्यायाधीश के प्रति आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करता है या न्यायिक गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले शब्दों का उपयोग करता है।
- न्यायिक कार्यवाही में बाधा – यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की कार्यवाही में किसी भी प्रकार की रुकावट डालता है।
- न्यायालय के प्रति दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी – यदि कोई व्यक्ति न्यायालय के निष्पक्ष निर्णय लेने की क्षमता पर संदेह प्रकट करता है या न्यायालय को अनुचित रूप से प्रभावित करने का प्रयास करता है।
- अन्यायिक प्रभाव डालने का प्रयास – न्यायालय में चल रही किसी भी कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए बाहरी दबाव, प्रचार-प्रसार, या भ्रामक जानकारी देना।
अपराधात्मक अवमानना के उदाहरण
- किसी न्यायाधीश के विरुद्ध सोशल मीडिया पर झूठी या आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करना।
- न्यायालय के आदेशों को सार्वजनिक रूप से आलोचना कर उनका पालन न करना।
- न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करना, जैसे – अदालत में हंगामा करना या झूठे बयान देना।
- न्यायालय की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करने वाले बयान देना।
न्यायालय की शक्ति और दंड
अपराधात्मक अवमानना के लिए न्यायालय को कठोर दंड देने की शक्ति प्राप्त है। न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के अनुसार, अपराधी को छह माह तक की कारावास या 2,000 रुपये तक का जुर्माना, अथवा दोनों दंड दिए जा सकते हैं। न्यायालय विशेष परिस्थितियों में क्षमा भी कर सकता है यदि दोषी अपने कृत्य के लिए खेद प्रकट करे।
संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत यह स्वतंत्रता न्यायालय की गरिमा बनाए रखने के अधीन होती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर न्यायालय के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण बातें करता है, तो यह अवमानना मानी जाएगी।
अपराधात्मक अवमानना से बचाव
- न्यायालय के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें।
- किसी न्यायिक प्रक्रिया में जानबूझकर हस्तक्षेप न करें।
- न्यायालय के आदेशों की अवहेलना न करें।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करें।
निष्कर्ष
अपराधात्मक अवमानना न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने के लिए आवश्यक विधिक प्रावधान है। हालांकि, इसे न्यायिक आलोचना एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संतुलित रखना भी आवश्यक है। न्यायपालिका को अनुशासित एवं प्रभावी बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि कोई भी व्यक्ति न्यायालय की निष्पक्षता एवं स्वायत्तता पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava
on
मार्च 03, 2025
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