सिविल अवमानना में प्रतिरक्षा (Defence) किन परिस्थितियों में ली जा सकती है? प्रमुख न्यायिक निर्णयों के साथ चर्चा
परिचय
सिविल अवमानना (Civil Contempt) का तात्पर्य न्यायालय के आदेश, निर्णय, प्रक्रिया या निर्देश की अवहेलना या उल्लंघन से है। यह अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(b) के तहत परिभाषित की गई है। हालाँकि, कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को सिविल अवमानना से बचाव (Defence) का अधिकार मिलता है।
सिविल अवमानना के लिए आवश्यक तत्व
किसी कार्य को सिविल अवमानना मानने के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है—
- न्यायालय का आदेश या निर्देश होना चाहिए।
- जानबूझकर उस आदेश का उल्लंघन किया गया हो।
- अवमानना करने वाले व्यक्ति को आदेश की जानकारी होनी चाहिए।
- आदेश का उल्लंघन गंभीर और प्रत्यक्ष रूप से न्यायालय के अधिकारों को प्रभावित करता हो।
सिविल अवमानना में बचाव (Defence) के आधार
कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें प्रतिवादी (Respondent) को बचाव का अधिकार प्राप्त होता है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं—
1. आदेश की अस्पष्टता (Ambiguity in Order)
यदि न्यायालय का आदेश अस्पष्ट (Unclear) है या उसमें स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, तो व्यक्ति यह तर्क दे सकता है कि उसने आदेश की सही व्याख्या नहीं की, जिससे उसका पालन नहीं हो सका।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- Niaz Mohammad v. State of Haryana (1994) 6 SCC 332
इस मामले में न्यायालय ने कहा कि यदि आदेश स्पष्ट नहीं है और प्रतिवादी ने अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार पालन किया, तो इसे अवमानना नहीं माना जा सकता।
2. जानबूझकर उल्लंघन न होना (Lack of Willful Disobedience)
यदि किसी व्यक्ति ने न्यायालय के आदेश का उल्लंघन जानबूझकर नहीं किया है, बल्कि यह गलती से या परिस्थितिवश हुआ है, तो इसे बचाव के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- R.N. Dey v. Bhagyabati Pramanik, (2000) 4 SCC 400
न्यायालय ने माना कि केवल तकनीकी उल्लंघन होने से अवमानना सिद्ध नहीं होगी, जब तक कि जानबूझकर आदेश का उल्लंघन न किया गया हो।
3. आदेश का पालन असंभव होना (Impossibility of Compliance)
यदि किसी व्यक्ति के लिए न्यायालय के आदेश का पालन करना असंभव (Impossible) हो, तो यह एक वैध बचाव माना जाता है।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- State of Bihar v. Subhash Singh, (1997) 4 SCC 430
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के लिए परिस्थितिवश आदेश का पालन करना असंभव हो, तो यह अवमानना नहीं होगी।
4. आदेश के विरुद्ध अपील या स्थगन (Appeal or Stay of Order)
यदि व्यक्ति ने उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में आदेश के विरुद्ध अपील दायर की है और उसे स्थगन (Stay) मिल गया है, तो उस आदेश का पालन न करने पर अवमानना का मामला नहीं बनता।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- Baradakanta Mishra v. Bhimsen Dixit, (1973) AIR 2255 SC
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक आदेश को चुनौती देने वाली अपील लंबित है और स्थगन प्राप्त हो चुका है, तब तक अवमानना की कार्यवाही नहीं की जा सकती।
5. अप्रत्याशित परिस्थितियाँ (Unforeseen Circumstances)
अगर कोई बाहरी या अप्रत्याशित परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसके कारण आदेश का पालन संभव नहीं रह जाता, तो यह एक वैध बचाव हो सकता है।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- J.R. Parashar v. Prashant Bhushan, (2001) 6 SCC 735
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि प्राकृतिक आपदा, युद्ध, आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियाँ आदेश के पालन में बाधा डालती हैं, तो अवमानना का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
6. निष्क्रियता (Laches) या देरी (Delay) का सिद्धांत
यदि अवमानना याचिका बहुत देर से दायर की जाती है और याचिकाकर्ता स्वयं निष्क्रिय रहा है, तो प्रतिवादी इसका बचाव कर सकता है।
🔹 महत्वपूर्ण निर्णय:
- P.N. Duda v. P. Shiv Shankar, (1988) AIR 1208 SC
न्यायालय ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने वर्षों तक आदेश के उल्लंघन पर कोई आपत्ति नहीं जताई, तो यह अवमानना का मामला नहीं बनता।
निष्कर्ष
सिविल अवमानना का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा बनाए रखना है, लेकिन इसमें व्यक्ति को उचित बचाव (Defence) का अवसर भी मिलता है। न्यायालय प्रत्येक मामले में परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह तय करता है कि अवमानना जानबूझकर की गई थी या नहीं। अस्पष्ट आदेश, पालन की असंभवता, आदेश के विरुद्ध अपील, निष्क्रियता जैसी परिस्थितियों में प्रतिवादी सिविल अवमानना से बच सकता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण
- सिविल अवमानना का उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराना है।
- प्रतिवादी को आदेश न मानने का उचित कारण साबित करने का अवसर दिया जाता है।
- असंदिग्ध एवं जानबूझकर अवज्ञा ही सिविल अवमानना मानी जाती है।
इसलिए, न्यायालय प्रत्येक मामले में तथ्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करके यह निर्णय करता है कि अवमानना हुई है या नहीं।
Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava
on
मार्च 03, 2025
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