अधिवक्ताओं की प्रवेश, नामांकन एवं अधिकारों पर विस्तृत चर्चा

 

अधिवक्ताओं की प्रवेश, नामांकन एवं अधिकारों पर विस्तृत चर्चा



भूमिका

भारतीय कानूनी प्रणाली में अधिवक्ताओं (Advocates) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे न्यायालयों में अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करते हैं और न्याय दिलाने की प्रक्रिया में सहायक होते हैं। अधिवक्ताओं की प्रवेश प्रक्रिया, नामांकन (Enrollment) एवं उनके अधिकारों को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) के अंतर्गत विनियमित किया जाता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अधिवक्ताओं को एक व्यवस्थित रूप से कानूनी पेशे में सम्मिलित करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।


1. अधिवक्ताओं का प्रवेश (Admission of Advocates)

(i) प्रवेश के लिए अर्हताएँ

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24 में अधिवक्ता बनने के लिए निम्नलिखित अर्हताओं (Eligibility) का उल्लेख किया गया है—

  1. भारतीय नागरिकता – आवेदक को भारतीय नागरिक होना चाहिए।
  2. न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता – आवेदक के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से कानून (LL.B.) की डिग्री होनी चाहिए।
  3. बार काउंसिल परीक्षा (AIBE) – अधिवक्ता को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बार परीक्षा (All India Bar Examination - AIBE) उत्तीर्ण करनी होती है।
  4. नैतिक चरित्र (Good Character) – आवेदक को एक नैतिक एवं सदाचारी व्यक्ति होना चाहिए।
  5. दो बार नामांकन निषिद्ध (No Dual Enrollment) – कोई भी व्यक्ति दो अलग-अलग राज्यों की बार काउंसिल में एक साथ नामांकित नहीं हो सकता।

2. अधिवक्ताओं का नामांकन (Enrollment of Advocates)

(i) नामांकन प्रक्रिया

अधिवक्ताओं के नामांकन का कार्य संबंधित राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) द्वारा किया जाता है। नामांकन की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में होती है—

  1. आवेदन पत्र जमा करना – अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24(1) के तहत इच्छुक व्यक्ति को संबंधित राज्य बार काउंसिल में निर्धारित आवेदन पत्र और शुल्क के साथ आवेदन करना होता है।
  2. दस्तावेज़ों की समीक्षा – बार काउंसिल आवेदक के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों, चरित्र प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की जांच करती है।
  3. नामांकन संख्या जारी करना – सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद, आवेदक को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा एक नामांकन संख्या (Enrollment Number) प्रदान की जाती है।
  4. बार परीक्षा (AIBE) देना – नामांकन के बाद, अधिवक्ता को अखिल भारतीय बार परीक्षा (AIBE) पास करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, अधिवक्ता को बार काउंसिल द्वारा 'प्रैक्टिस करने का प्रमाणपत्र' (Certificate of Practice) दिया जाता है।

3. अधिवक्ताओं के अधिकार (Rights of Advocates)

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 और 33 के तहत अधिवक्ताओं को कई विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार अधिवक्ताओं को उनके पेशेवर दायित्वों को सुचारू रूप से निभाने में सहायता करते हैं।

(i) न्यायालयों में प्रैक्टिस का अधिकार (Right to Practice in Courts)

  • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के अनुसार, किसी भी अधिवक्ता को पूरे भारत में किसी भी न्यायालय, अधिकरण (Tribunal) या प्राधिकरण (Authority) के समक्ष प्रैक्टिस करने का अधिकार प्राप्त है।
  • यह अधिकार उन्हें सभी न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक मंचों पर अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति देता है।

(ii) कानूनी परामर्श देने का अधिकार (Right to Give Legal Advice)

  • अधिवक्ताओं को नागरिक एवं आपराधिक मामलों में कानूनी परामर्श (Legal Advice) देने का अधिकार है।
  • वे अपने मुवक्किलों को उचित विधिक मार्गदर्शन देकर न्याय दिलाने में सहायता करते हैं।

(iii) गोपनीयता का अधिकार (Right to Confidentiality)

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act, 1872) की धारा 126 के तहत अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच हुई बातचीत गोपनीय होती है।
  • अधिवक्ता अपने मुवक्किल की जानकारी बिना अनुमति के किसी अन्य को नहीं बता सकता।

(iv) निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार (Right to Fair Hearing)

  • अधिवक्ता को अपने मुवक्किल की ओर से न्यायालय में निष्पक्ष सुनवाई करवाने का अधिकार है।
  • न्यायपालिका द्वारा अधिवक्ताओं को उचित समय और अवसर दिया जाना चाहिए ताकि वे अपने मुवक्किल के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कर सकें।

(v) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech & Expression)

  • अधिवक्ता अपने मुवक्किल के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करते समय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत स्वतंत्र रूप से अपनी बात कह सकते हैं।
  • हालांकि, यह अधिकार न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में नहीं आना चाहिए।

(vi) संगठन बनाने का अधिकार (Right to Form Associations)

  • अधिवक्ता अपने अधिकारों एवं हितों की रक्षा हेतु विभिन्न अधिवक्ता संघों (Bar Associations) का गठन कर सकते हैं।
  • इन संघों के माध्यम से वे अपने पेशे से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए एकजुट होकर कार्य कर सकते हैं।

4. अधिवक्ताओं के उत्तरदायित्व (Duties of Advocates)

अधिवक्ताओं को अपने पेशेवर आचरण (Professional Ethics) और नैतिकता (Morality) का पालन करना आवश्यक होता है। उनके कुछ प्रमुख उत्तरदायित्व इस प्रकार हैं—

  1. न्यायालय के प्रति दायित्व – अधिवक्ता को न्यायालय का सम्मान करना चाहिए और ईमानदारी से अपनी बात रखनी चाहिए।
  2. मुवक्किल के प्रति दायित्व – अधिवक्ता को अपने मुवक्किल की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए और उनके हितों की रक्षा करनी चाहिए।
  3. सहकर्मियों के प्रति दायित्व – अधिवक्ताओं को अपने साथी अधिवक्ताओं के प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
  4. सार्वजनिक उत्तरदायित्व – अधिवक्ता को समाज की भलाई के लिए निःशुल्क विधिक सेवा (Pro Bono Services) प्रदान करनी चाहिए।

निष्कर्ष

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत अधिवक्ताओं को प्रवेश, नामांकन और विभिन्न कानूनी अधिकार प्रदान किए गए हैं, जो उन्हें एक स्वतंत्र और सशक्त कानूनी पेशेवर बनने में सहायता करते हैं। उन्हें न्यायपालिका के प्रति निष्ठावान रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए ताकि न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। अधिवक्ताओं के अधिकारों के साथ-साथ उनके दायित्वों को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए, जिससे भारतीय न्याय प्रणाली को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके।

अधिवक्ताओं की प्रवेश, नामांकन एवं अधिकारों पर विस्तृत चर्चा अधिवक्ताओं की प्रवेश, नामांकन एवं अधिकारों पर विस्तृत चर्चा Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava on मार्च 03, 2025 Rating: 5

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