अवमानना (Contempt of Court) की विस्तृत व्याख्या एवं उसके आवश्यक तत्व
परिचय
न्यायपालिका किसी भी लोकतांत्रिक देश का महत्वपूर्ण स्तंभ होती है। यह नागरिकों को न्याय प्रदान करने और विधि के शासन को सुनिश्चित करने का कार्य करती है। न्यायपालिका की गरिमा और सम्मान बनाए रखना आवश्यक होता है, ताकि इसका प्रभावी संचालन सुनिश्चित हो सके। यदि कोई व्यक्ति न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करता है या न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाता है, तो इसे "अवमानना (Contempt of Court)" कहा जाता है।
भारत में न्यायालय की अवमानना से संबंधित प्रावधान "न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971" (Contempt of Courts Act, 1971) के अंतर्गत आते हैं। यह अधिनियम न्यायालय की गरिमा बनाए रखने और न्यायपालिका की निष्पक्षता व प्रभावशीलता की रक्षा करने के लिए लागू किया गया था।
अवमानना की परिभाषा (Definition of Contempt of Court)
न्यायालय की अवमानना का अर्थ है—
- न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करना।
- न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना।
- न्यायालय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना।
- किसी न्यायाधीश या न्यायिक कार्यप्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा करना।
विधिक परिभाषा
न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2 के अनुसार, अवमानना को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है—
- न्यायालय की अवमानना (Civil Contempt)
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt)
सर्वोच्च न्यायालय का मत
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने "Re: Arundhati Roy, (2002) 3 SCC 343" में अवमानना को न्यायपालिका की शक्ति की रक्षा का आवश्यक उपाय बताया है, जिससे आम जनता का न्यायिक प्रणाली पर विश्वास बना रहे।
न्यायालय की अवमानना के प्रकार (Types of Contempt of Court)
1. सिविल अवमानना (Civil Contempt)
सिविल अवमानना तब होती है जब कोई व्यक्ति न्यायालय के आदेशों, निर्देशों, निर्णयों, आदेश-पत्रों (writs) या अन्य कानूनी आदेशों की अवहेलना करता है या उन्हें मानने से इनकार करता है।
उदाहरण:
- किसी व्यक्ति को न्यायालय ने संपत्ति विवाद में आदेश दिया कि वह संबंधित संपत्ति को दूसरे पक्ष को सौंप दे, लेकिन वह ऐसा करने से मना कर देता है।
- किसी सरकारी अधिकारी को न्यायालय ने किसी नागरिक को सूचना देने का निर्देश दिया, लेकिन वह इसका पालन नहीं करता।
2. आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt)
आपराधिक अवमानना तब होती है जब कोई व्यक्ति—
- न्यायालय के प्रति असम्मानजनक व्यवहार करता है।
- न्यायालय के आदेशों का मजाक उड़ाता है।
- न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने या बाधित करने का प्रयास करता है।
- न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करता है।
उदाहरण:
- किसी पत्रकार द्वारा न्यायालय के विरुद्ध अपमानजनक लेख प्रकाशित करना।
- किसी व्यक्ति द्वारा न्यायालय में झूठे प्रमाण प्रस्तुत करना।
- किसी न्यायाधीश के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करना।
अवमानना के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Contempt of Court)
1. न्यायालय का अस्तित्व एवं अधिकारिता (Existence & Jurisdiction of the Court)
अवमानना का अपराध तभी उत्पन्न होता है जब कोई कार्य किसी मान्यता प्राप्त न्यायालय की प्रतिष्ठा और कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है।
2. जानबूझकर आदेश की अवहेलना (Willful Disobedience of Court Orders)
सिविल अवमानना के मामले में यह आवश्यक है कि आरोपी ने जानबूझकर न्यायालय के आदेश का पालन न किया हो।
3. न्यायालय की गरिमा को नुकसान (Prejudice to the Authority of Court)
यदि किसी व्यक्ति की गतिविधि न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुँचाती है, तो यह अवमानना होगी।
4. न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप (Interference in Judicial Proceedings)
यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की कार्यवाही को बाधित करता है या किसी केस के फैसले को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो यह आपराधिक अवमानना होगी।
5. समाज में न्यायालय की छवि खराब करना (Scandalizing the Court)
न्यायपालिका के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना, गलत समाचार फैलाना या न्यायाधीशों पर बेबुनियाद आरोप लगाना अवमानना के अंतर्गत आता है।
अवमानना से बचाव (Defenses Against Contempt of Court)
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सत्यता का प्रमाण (Truth as a Defense):
यदि किसी व्यक्ति ने न्यायालय के प्रति कोई आलोचना की है, लेकिन वह सत्य पर आधारित है और लोकहित में है, तो यह अवमानना नहीं होगी। -
न्यायालय की आलोचना का अधिकार (Right to Criticize Court):
यदि कोई व्यक्ति न्यायालय के निर्णयों की स्वस्थ आलोचना करता है, तो उसे अवमानना नहीं माना जाएगा। -
अनजाने में की गई गलती (Unintentional Act):
यदि किसी व्यक्ति का कृत्य अनजाने में हुआ है और उसका उद्देश्य न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं था, तो यह अवमानना नहीं होगी। -
माफी मांगना (Apology):
यदि अवमानना का आरोपी न्यायालय से बिना शर्त माफी मांग लेता है और न्यायालय इसे स्वीकार कर लेता है, तो सजा को टाला जा सकता है।
अवमानना का दंड (Punishment for Contempt of Court)
न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत—
- अधिकतम सजा: 6 महीने की कैद या ₹2,000 तक का जुर्माना, या दोनों।
- माफी का प्रावधान: यदि आरोपी सच्चे हृदय से माफी मांगता है, तो न्यायालय उसे क्षमा कर सकता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Landmark Judgments on Contempt of Court)
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P. N. Duda v. P. Shiv Shankar, 1988
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की तर्कसंगत और स्वस्थ आलोचना अवमानना नहीं होगी। -
Arundhati Roy Contempt Case, 2002
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के दायरे को स्पष्ट किया और यह निर्णय दिया कि न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। -
Prashant Bhushan Contempt Case, 2020
सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणियों के लिए अवमानना का मामला चलाया और उन्हें दोषी ठहराया।
निष्कर्ष (Conclusion)
न्यायालय की अवमानना एक गंभीर अपराध है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा के लिए लागू किया गया है। हालाँकि, यह भी आवश्यक है कि इस प्रावधान का उपयोग केवल न्यायालय की गरिमा बनाए रखने के लिए किया जाए, न कि आलोचना को दबाने के लिए। लोकतंत्र में न्यायपालिका को आलोचना सहन करने की शक्ति होनी चाहिए, लेकिन वह आलोचना तथ्यपरक और लोकहित में होनी चाहिए।
"न्यायपालिका का सम्मान करना, कानून के शासन को बनाए रखने का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है।"
Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava
on
मार्च 03, 2025
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